Monday, August 21, 2017

चाह

और कुछ भी न रहा चाहने के लिए 
यूँ खुलकर कहूँ अगर तो झूठ होगा 

यक़ीं के झाँसे में यक़ीं की चाहत है। 

There is nothing more to wish for,
It will be a lie if I say it out aloud,

I wish to believe in make believe.

Thursday, August 17, 2017

नाव

अकेलापन खोजती रहती है हमेशा सरे आम भी वो
वक़्त बेवक़्त रिसती-छलक पड़ती रेंगती खारी बूँद

तुम्हारी यादें नाव सी डोलती रहती हैं आँखों में मेरी।

Ever seeking solitude, even when with company, that
Time-untimely, seeping-spilling crawling saline drop,

Your memories're boats adrift, in my brimming eyes.

Monday, August 7, 2017

बज़्म

है ज़र्द ए सफ़हे सियाही
है वीरान बज़्म ए नज़्म

ख़त जो तुम्हे भेजे नहीं।

Yellowing are the inked pages,
A desolate company of verses,

Those letters never sent to you.

ज़र्द- yellowed/aged;  सफ़हे-pages;  बज़्म- company/gathering/mehfil

Wednesday, August 2, 2017

तिल

देर रातों की चाँदनी में लिपटे दो जिस्म
उँगलियाँ छूंती-तराशती, देखतीं-जानतीं

निचली कमर पर तुम्हारे, राई सा तिल।

Two bodies bathed in late nights' moonlight,
As the fingers feel, carve, see and recognize,

The tiny little mole in the small of your back.

Saturday, July 29, 2017

क़ैफ़ी

आवारा पन्नों में बसती हुईं
जैसे, चंद बाग़ी क़ैफ़ी नज़्में

महज़ लफ़्ज़ों के परे हो तुम।

Living within vagabond pages,
Few high-spirited rebel verses,

You're one beyond mere words.

क़ैफ़ी- of high spirits

Tuesday, July 25, 2017

कश्मकश

क्यों सही
क्यों नहीं

ज़िन्दगी!

Why so
Why no

Living!

Monday, July 17, 2017

सूरत

कम ही देखी है मगर जब भी सूरत निकली है ऐसी
नज़र भर कर देखी है, बिंदिया सजी सूरत तुम्हारी

आओ सजा दूँ माथे पर तुम्हारे, रात का पूरा चाँद।

Rarely have I seen, but whenever it has so happened,
I've gazed my content upon your bindi adorned face,

Come, let me grace your temple with this full moon.