Saturday, June 25, 2016

मैं?

वो पत्थर नहीं जिसे गुज़रती हवा तराश दे
दीवार ईंट की जो बस कतरा कतरा बिखरे

सुना है के मैं हूँ, क्या सचमुच ये मैं ही हूँ?

Not like a wind carved stone,
Rather a disintegrating wall,

Heard it's me; really is it me?

Monday, June 20, 2016

छाप

सीसे की ग़लती रबड़ रगड़ निकलता है
सियाही रगड़ो तो क़ाग़ज़ उधड़ जाता है

मीटने को तैयार हूँ, ये छाप मीट जाए।

Lead's mistakes can still well be erased,
Rubbing off Ink, shreds the Paper itself

Ready to End, if it can then be Erased.

Saturday, June 11, 2016

पोशीदा

इक अर्सा हुआ आज सियाही अब कुछ भी न रही
क़ाग़ज़ पर क़लम के पोशीदा निशान होते जाते है

ज़रा सा छूँ कर देखना, उँगलियाँ पढ़ लेंगीं ज़ख्म।

There's been no Ink, since an age now, 
Pen keeps invisibly marking the Paper,

Touch and Fingers'll read the wounds.

Tuesday, June 7, 2016

बोसा

नरम रुई की डली
चाय की नम भाप

तुम्हारा वो बोसा।

A soft ball of cotton 
Moist steaming Tea,

That Kiss of Yours.

Wednesday, June 1, 2016

ठहर

रगों की दौड़ थक गयी है
मौका नहीं है आराम का

तुम आओ तो ठहर जाऊँ।

Flowing tired Veins, Nothing worth a rest,
If only You could come, I can finally Rest.