Sunday, November 25, 2012

ख्वाब का पेड़

रात एक बार इक ख्वाब से गुज़रते 
मैदान में उस ख्वाब का बीज बोया था।
अगली कई रातों तक ख्वाब बरसते रहे,
आज यूँ ही टहलते-टहलते मैदान में 
इक नया पेड़ दिखा, जिसे पहले न देखा था।
सोचा दम भर इस नई छाँव में बैठ फिर 
घर की ओर मुड़ जाऊंगा।
कब आँख लगी, पता ही न चला।

ख्वाब में देखा मेरे बीज का पेड़ बन गया है,
और उसकी छाँव में लेटे,
मैं फिर ख्वाब देख रहा हूँ। 

Monday, November 5, 2012

अलार्म

कल रात ख्वाब देखते देखते
अचानक छींक आ गई,
ख्याल चन्द उस ख्वाब के
अँधेरे में बिखर गए।
वो कुछ सुहाना सा
जान पड़ा था ख्वाब,
सो इक मोम बत्ती लिए
अँधेरे टटोलने निकल पड़ा।
ज्यूं ज्यूं टुकड़े मिलते गए,
ख्वाब मैं अपना जोड़ता गया।
आखरी टुकड़ा बस जोड़ा ही था,
कबख्त!
सुबह छः बजे का अलार्म बज गया।
नींद चौंक कुछ यूँ खुली के
रात भर बटोरा ख्वाब वो
फिर टूटके बिखर गया।

Wednesday, October 31, 2012

पैग़ाम

आँखों से पैग़ाम लिखा करती थी
काजल की स्याही में नज़र डुबोके।


पलकें झपक के वो भेज देती थी
बिना पतों के वो पैगाम- क्या जाने
किसे मिले वो, कौन उन्हें पढ़ता हो।
अपना पता नहीं लिखती थी मगर,
जवाब का इंतज़ार ज़रूर करती थी।


आँखों से पैग़ाम लिखा करती थी
काजल की स्याही में नज़र डुबोके।


नेरुदा की इक नज़्म पर ग़ौर करते
बुकस्टोर के इक कोने में बैठा, यूँ ही  
दो बच्चियों को सुन रहा था बात करते
ऑस्टेन और ‘यू’एव गोट मैल’ पर जब,
ग़ालिबन दिल पर दस्तक हुई; मैंने देखा


आँखों से पैग़ाम लिख भेजा था इक उसने काजल की स्याही में अपनी नज़र डुबोके।



Friday, October 26, 2012

शिकायत

रात फिर जागते कट रही थी,
किताबें भी मुझसे ऊब चुकीं थी,
कलम मेज़ पर सुस्ता रही थी,
बालकनी के खुले दरवाज़े से 
चाँदनी झिझकती झाँक रही थी।
कुर्सी ज़रा पीछे खुकाए बहार देखा  
चाँद मूंह सिकोड़े पीला पड़ा हुआ था।
"क्यूँ  ऐसे जागते रहते हो, तुम्हे यूँ 
देख रात मुझे बुरे सपने आते हैं।"

Thursday, October 25, 2012

इन्तेहा

एक कंकड़ उछाल फेंका है सोच
चोट इन्तेहा को जा लगेगी।
वो वापस लौट मेरे माथे को लगा
देखा इन्तेहा वहाँ मुस्काने लगी।

Tuesday, October 16, 2012

बित्ता-बित्ता

हर अमावास से अमावास तक,
वो बैठा रात की चादर काढ़ता है।
तारों के छींटों के आगे हर रोज़,
बित्ता-बित्ता भर पूरा चाँद काढ़ता  है।

Thursday, August 16, 2012

फ़िर्दौसी-फ़िरोज़ी

अटारी की खिड़की की देहली पे
एक तख्ती लगा उस पर चढ़,
उछल-उछल कोशिश करता हूँ
के किसी रोज़ उँगलियाँ मेरी,
फ़िर्दौस की फ़िरोज़ी धूल छू आयें।
मेरा मन थका उदास सा है,
उस पर ज़रा वो धूल मल लूं के,
वो भी ज़रा उछल
फ़िर्दौसी-फ़िरोज़ी हो जाए।

अटारी- attic; देहली- window sill; तख्ती- wooden plank; फ़िर्दौस- heavens/ garden in paradise; फ़िरोज़ी- turquoise. 


Monday, July 30, 2012

सन्ताराश

ज़हन में एक अर्से से
रोज़ थोड़ा थोड़ा कर
एक ख़याल तराश रहा था।
कुछ बातों के हथौड़े बना,
चन्द लफ़्ज़ों की छैनी पर,
टुक-टुक ठोकता रहता था।

एक चोट हथौड़े की आज
मग़र ग़लत पड़ गयी,
छैनी हाथ से फिसल गयी,
और अनचाही चिंगारियों
से घिरा वो  ख़याल फिर,
झुलस के टूट गया।

अब जाने फिर कब वो
छैनी हथौड़ी हाथ लगें,
और फिर मैं ख़याल तराशूं।



Friday, July 27, 2012

मुर्दा पल

रात सरकती गुज़र रही थी,
वक़्त रेंगता कट रहा था।
पसीने से भीगे चेहरे पे उसके,
बूँद भर खून का टपक रहा था।

कहा मार आया हूँ एक पल वहाँ,
अब रूह उसकी पीछा कर रही है।
ज़रा दम भरलूँ ठहर के कहीं पर,
रूह सर चढ़े इस ताक़ में बैठी है।

भाग वो रहा था, लेकिन बेरफ्तार,
धौंकनी सा सीना साँस से ख़ाली था।
घुटी आँख में टपका खून उतर पड़ा,
मुर्दा पल वो आख़िर सर चढ़ गया था।

Thursday, July 26, 2012

मैं आप हम

कभी इक मैं था,
मैं की आदत ही सी थी।
फिर मैं और आप हुए,
मैं की आदत छूटने लगी।
जाने कब आप मैं हम हो गए,
आदत पड़ते भी देर न लगी।

कुछ रोज़ पहले मगर,
हम फिर मैं ही हो गया।
कोशिश करते भी मगर, अब 
मैं की आदत नहीं पड़ रही।



Thursday, May 24, 2012

उर्दू

बचपन में अंग्रेज़ी ओ हिंदी
के अल्फाज़ों के बीच अचानक
जब रेडियो पे कभी ग़ज़ल
सुन लिया करते थे उर्दू में,
तो यूँ लगता था के अचानक
घाँस के मैदान पे चलते चलते
किसी पत्तेदार दरख़्त से मुखातिब हुए.
आगे भले ही चल पड़ना हो,
बस चंद लम्हे तो ठहर गुज़र लें
दरख़्त-ए-उर्दू  के ठन्डे साए में.

Thursday, May 10, 2012

नामुराद

सुबह के नाश्ते में आज
चाय बिस्कुट के साथ
भोर कि धुप भी चखी थी.
सो दिन आज का पूरा 
ताज़ा ताज़ा गुज़रना था,
पर गुज़रा नहीं.

नामुराद ये खाँसी न जाने
कब पीछा छोड़ेगी ?

Tuesday, May 8, 2012

मन

मन पँखों पे सवार
उड़ा है खोज में 
के मिले कहीं तो 
उतरे उस शाँत डाल पे.

Monday, May 7, 2012

तुम्हारा नाम ही सही

रात छत पे बैठ
चाँद की रौशनी में
आस्मां की स्याही में
अपनी कलम डुबोता हूँ.
उस पुरानी डायरी में फिर
तरह तरह से बनाकर
तुम्हारा नाम लिखता हूँ.
कोशिश करता हूँ
किसी में तुम्हारी मासूमियत,
किसी में शरारत
किसी में गुस्सा तो,
किसी में तुम्हारी मुस्कुराहट,
शायद झलक जाये.
वक़्त बीतता पता नहीं चलता.

तुम साथ न हो तो क्या,
तुम्हारा नाम ही सही.

Sunday, May 6, 2012

सन्नाटे को शाँत करूँ

ख़याल इक दूजे से टकराने लगे हैं,
सन्नाटा आज फिर शोर कर रहा है .
अब सब मुझसे पूछने लगे हैं,
अर्सा हुआ, तू लिख क्यों नहीं रहा है?

शायद कुछ ज़हन को कचोट रहा था,
जाने उसे कैसे और कहाँ जा ढूँढूं ?
खैर, आज पर चुप्पी को ज़रा तोड़, 
कमस्कम, उस सन्नाटे को शाँत करूँ.


112 days- That's how long it had been since I'd updated my blog or written anything for that matter. So, here's breaking the dry spell and hoping that today's sprinkles go on to be the monsoons. Feels good to be back.