Saturday, August 13, 2011

ये साथी मेरे

मेरी ख़ामोशी पे वो
नाराज़ नहीं होतीं हैं.
फिर भी पर मुझसे  वो,
हमेशा ही बोलती हैं.

बचपन से ही मेरे, हर
सफ़र में साथ रहीं हैं.
रास्ते मंज़िलों के पर,
सवाल पूछतीं नहीं हैं.

मौके ख़ुशी के हों,
इन से बातें हुईं हैं.
वक़्त ग़म का हो,
इन्होंने पनाह दी है.

इनकी छुअन का एहसास,
उँगलियों से रूह तक जाता है.
परत दर परत इक ख़ास,
महक साँसों में छोड़ जाता है.

सिरहाने तकिये के बगल,
या फिर सीने पे  टिकाकर,
कहीं कभी यूँ ही कुछ पल,
सो गया हूँ सब भुलाकर.

है बस छोटी सी इक हसरत,
ये साथी मेरे ताहउम्र शादाब रहें.
आखरी आदाब का हो वक़्त,
तो हाथ में मेरे इक किताब रहे.

Friday, August 12, 2011

कमरा

कमरा काफ़ी पुराना है,
आज नया रंगवाया है। 
चौखट एक अरसे की है,
दरवाज़ा नया लगवाया है। 

कुछ पुराने किस्से पड़े थे,
सब झाड़ के खाली करवाए। 
फूल मेज़ पर ताज़े रखे हैं,
शायद कोई मेहमां आजाए। 

Thursday, August 11, 2011

मुआफी

वो ख़फ़ा हो आज,
बिन कहे चले गए,
मैं उलझन में,
अपनी ख़ता ढूंढता हूँ.

कहा होता क्या हुई बात,
इस तरह बिगड़ गए.
मैं फिर उलझन में,
अपनी मुआफी लिखता हूँ.

Wednesday, August 10, 2011

गश्त

खुश्क अश्कों से भीगा रुमाल कल,
रात की कच्ची बारिश में सुखाया था.
गश्त में बेहोश सूखी पलकों को,
जिससे उम्मीद से हमने सहलाया था.

के धुन्दले उफ़क पे नज़र आएगा,
ज़र्द फ़लक के इक छोर पे वो.
किसी गुम खोज की तलाश में,
इक रोज़ यहाँ से गया था जो.


खुश्क- dry;  अश्क- tears;  गश्त- vigil/patrol (meant as a wait here);  उफ़क- horizon; ज़र्द- yellow/golden;  फ़लक-sky

Tuesday, August 9, 2011

तोहफ़ा

कुछ टूटी ग़ज़लें समेटीं हैं,
चंद बिखरे नगमे बटोरे हैं। 

थोड़ी पुरानी नज़्में निकाली हैं,
और बेतुके मिस्रे टटोले हैं। 

इस सोच में ये दिन बीता है,
यूँ रात भी बीतने वाली है। 

कल तोहफ़ा इक नज़र करना है,
शहर से आप जो गुजरने वाली हैं।    

Monday, August 8, 2011

माटी

तन माटी का गढ़ा हुआ,
माटी ही की जान,

साँस बसी माटी की हवा,
है माटी ही पहचान। 

Sunday, August 7, 2011

साक़ी, मैं

मय का शौक़ मैं नहीं रखता, के साक़ी हूँ मैं,
मयखानों की खाक़ मैं मरता, कुछ बाक़ी हूँ मैं.
सैंकड़ों ग़मों और खुशियों को नशे में घुलते देखा है,
प्याले मैं  छूटा-भूला जाम है, वो हालाँकि हूँ मैं.

Saturday, August 6, 2011

क्यों?

कदम दो कदम साथ चले जो,
क्या हमकदम थे आज  बने वो.
ताह उम्र जो साथ चलता आया,
आज वो कदम फरामोश क्यों?

मासूम

इत्तेफाक़न काम से घर जल्दी लौटा था,
क्यों न आज बाग़ में टेहेलने जाऊँ.
अपने सबसे हवादार कपड़े पहने,
आधी घिसी हरी चप्पलें डाली,
और किसी पलटन के जवान सा,
हात हिलाता बाग़ की ओर चल पड़ा.

बीच अप्रैल की वो शाम थी,
हल्की हवा में चम्पा की खुशबू थी.
कोई ख़ास बाग़ नहीं था हमारा,
बड़े शहरों के छोटे मोहल्लों जैसा,
हरे मैदान में यहाँ वहां कुछ पेड़,
कुछ फूल, एक फव्वारा, एक पगडण्डी.

छोटा, मगर खुश लगता था हमारा बाग़.
लोग भी कम ही आते थे-
ज्यादातर बुज़ुर्ग, कुछ इक्का-दुक्का जवान.
उस रोज़ भी सब ऐसा ही जान पड़ता था.
पर पगडण्डी के चौथे चक्कर पे मैंने देखा,
आज दो बच्चे अपनी माँ के साथ आए हैं.

उम्र चार या पाँच की होगी उनकी.
छोटी भैय्या को दौड़ा रही है,
भैय्या खिल्ली उड़ाता, रुकता भागता,
छोटी को खूब छेड़ रहा है.
इनके बीच माँ दोनों की सुलह को
तरसती, थक के घास पे बैठ गयी है.

मेरे भी सैर के कुछ दस चक्कर हो चुके थे,
थक के, पेड़ों तले की पुलिया पे बैठ गया.
बैठे-बैठे बच्चों की उछल कूद देख रहा था-
भैय्या भाग के मेरी ओर आता और लौट जाता.
मज़े से मैं भी हलके-हलके मुस्कुरा रहा था के
भैय्या अचानक भाग के मेरे बगल में आ बैठा.

मैंने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा,
शायद मेरी दाढ़ी मूछ देख पहले घबराया हो,
पर एक हल्की, शर्मीली हसी चेहरे पे आई, 
और देखते ही पूरा चेहरा खिलखिला उठा.
अचानक मेरे आस्तीन का सहारा लिए,
मेरे कंधे हाथ रख, मेरे बगल में खड़ा हो गया.

कुछ देर बड़े ग़ौर से, चश्मे के पार मेरी आँखों में देखा,
मैं ज़रा चौंकी नज़रों से मुस्कुराते हुए उसे देख रहा था.
उसने अचानक खिल्खिलाके मुझे अपने गले लगा लिया,
ज़रा पीछे होके मुझे देखा और हसके नीचे कूद पड़ा.
कुछ देर मैं समझ ही न सका के क्या हुआ,
फिर उसे हस्ते हुए अपनी माँ की और भागता देखा.

सोच में गुम, मैं अपने घर की ओर चला पड़ा.
एक अर्सा हुआ, मैं अकेले रहता था,
घर से दफ्तर, दफ्तर से घर भर की ज़िन्दगी थी.
इतवार  भी सोने-सफाई में निकल जाते थे. 
पर आज की बेवक्त इस सैर ने याद दिलाया,
इस ढर्रे के पार, मेरे अन्दर, अब भी कुछ मासूम है.



Thursday, August 4, 2011

कल

आज क्यों न यूं सोचें,
के शायद वो कल ही न मिले
हमें कुछ और सोचने की लिए.

कुछ उन खतों के बारे में,
जिनके जवाब टाले कहके,
के कल लिख लेंगे.

ज़रा उस ढीली चिटकनी का,
जो आज तक बंद नहीं करते,
ये सोचकर के कल सुधार लेंगे.

उन भूले बाग़ों का,
जिनके फूल न देख पाए,
के टेहेलने कल जाएँगे.

थोड़ा उन गर्मियों का,
जब तालाब ताकते रह गए,
 के छलांग कल लगाएँगे.

दस पैसे की हड़बड़ी में,
सालों पहले की बस टिकट का,
शुक्रिया कल अदा करेंगे.

अंग्रेज़ी लेक्चर के बीच,
उन कांपती झिझकती पलकों से,
नज़र कल ज़रूर मिलाएँगे.

बरसती कायनात की आवाज़,
आज छाते तले से सुनकर,
कल को भीग जाएँगे.

खुश ही तो होंगे वो,
बस दो घंटे दूर रहते हैं,
माँ बाबा से कल मिल आएँगे.

सोचें ज़रा के तब क्या हो,
जब आज ही रूठ के कह दे,
जाओ, हम भी अब कल आएँगे. .



Wednesday, August 3, 2011

दोराहा

I happened to remember today,Frost's The Road Less Taken. Was tempted to write a few lines about the same. Hope it inspires even a fraction of the yearning that Frost's did.


भीड़ एक ओर से बुलाती थी,
एक ओर सूनी सड़क इंतज़ार में है.

भीड़ की पुचकार,
कदम उस ओर खींचती.
सूनी सड़क की आहें,
मन को उस ओर रिझातीं.

भीड़ की रंग-ओ-उमंग से आँखें चमक उठतीं,
सूनी सड़क का शांत ठहराव दिल को सुकूँ देता.

प्यार भरी पुचकार,
या अल्साई आहें?
चटक रंगों की चमक,
या ठहरा शाँत सुकूँ? 

उस अनिश्चित दोराहे पर खड़े, आँखें मूंदे,
कुछ बिना सोचे बस अपने कदम बढ़ा दिए.

चार क़दमों पर चहल-पहल,
अगले चार पर एकान्त.
फिर चार पर भागता संघर्ष,
बाद के चार पर चैन की सांस.

अब हर दूसरे चार कदम धीमे होते गए,
और धीमे होते होते मैं बिलकुल रुक गया.

आँखें खोली तो,
मैं सूनी सड़क पे था.
ताज़ी गहरी सांस थी,
दिल में नया सुकूँ था.

पल भर को लगा की वो रंग-ओ-चमक अब न दिखेगी,
पर  वो चमक, इस सुकूँ के सामने फीकी पड़ जाएगी.

Tuesday, August 2, 2011

चाय

चाय मैं पीता नहीं हूँ,
हाँ ग़र खुशबू उसकी,
कोई प्याले में ले आए,
तो ना न कहा जाएगा.

कश्मकश

आज चल निकला हूँ हांफते थके क़दमों पर,
देखूं ग़र मंज़िल मिले इन कशमकशों के पार.