Tuesday, November 15, 2011

अक्सर

मैं जो अक्सर कहा करता हूँ
भूल जाया करता हूँ, अक्सर.
याद रखने की कोशिश में भी
अक्सर नाकाम रहा करता हूँ.

यूँ भूलते रहने में भी तो
अक्सर, मज़ा आया करता है.

Monday, November 14, 2011

रात का चूल्हा

रात के चूल्हे में कल
नींद सारी जलती रही.
काँच से ठन्डे धुंएँ में
मैं जागे काँपता  रहा.

जगा हूँ जब तो सोचा
के कुछ ख़याल पका लूं.
तपिश कुछ यूँ थी लेकिन
जो डाला वो जलता गया.

कोयला बने उन ख़यालों की
सर्द राख ठन्डे धुंएँ संग उठी.
रात के चूल्हे में जलती नींद
ताकते मैं काँपते जागता रहा.

Sunday, November 13, 2011

जाने कौन था

वो जाने कौन था जो आकर
ग़म कुछ ज़रा कम कर गया.
गया तो, एक सूखा आँसू भी
यादों की मिट्टी नम कर गया.

उस मिट्टी से जो खुशबु उठे वो
आहें और गहरी कर देती है.
जो चौखट पीछे छोड़ गया  वो
निगाहें वहीँ ठहरी कर देती है.

निगाहें भी ठहर-ठहर अब
कुछ पथराने सी लगी हैं.
सच्चाईयां मानने को सोच भी
कुछ कतराने सी लगी है.

कहीं आ ही जाए, इंतज़ार में
कुछ और किया नहीं जाता.
इक ग़लत या खुश फहमी है
और फैसला लिया नहीं जाता.

Saturday, November 12, 2011

निकाह

सज-संवर रेशम-पोश
एक ग़ज़ल चली है,
उसकी नज़्म के निकाह
की महफ़िल सजी है.

Friday, November 11, 2011

कल की बात

कबसे बैठा हूँ मेज़ पर
डायरी सामने खुली पड़ी है
पन्ना दो साल पुराना है
पर बात जो वो कहता है
कल ही की तो लगती है.
वो कहता है के तुम अब
मुझसे और न मिलोगे, तुम
मुझसे और कुछ कहोगे नहीं
न और हँसोगे मुझ पर और
न कोरे गुस्से से डाँटा करोगे.
रह-रह के यूँ लगता है बस
अब चाय की प्याली लिए
कन्धे पे हाथ रख कहोगी-
"चाय और गरम नहीं करुँगी!"

हाँ, तुम्हे गुज़रे,
आज पूरे दो साल हो गए.
पर बात अब भी
वो कल ही की लगती है.

Thursday, November 10, 2011

अकेला

एक बड़े मैदान में खड़ा अकेला
एक पतला सा पेड़ सोच रहा है
कोई दोस्त मेरा कुर्सी बना कोई
दरवाज़ा, कोई कागज़, कोई बना
था घर किसीका और कोई जल
चिता में, कभी चूल्हे में राख हुआ.
अब, मैं अकेला बचा, खड़ा यहाँ
अक्सर अपना अंजाम सोचता हूँ.

Wednesday, November 9, 2011

रात एक देर

दिन अब भी गरम ही हैं
पर रातें ठंडी होने लगी हैं.
हलकी-सौंधी आंच के साथ
बातें लम्बी होने लगी हैं.

छुट्टियों के दिन अब ज़रा
देर ही से शुरू हुआ करेंगे.
गप्पों के साथ रात हाथ में
कॉफ़ी के मग हुआ करेंगे.

कभी पुरानी फिल्मों के साथ
रातें अपनी देर किया करेंगे.
कभी किताबों के पन्नों संग
सुबह तक बात किया करेंगे.

शायद किसी दिन तुम्हे एक
कागज़ी ख़त लिखा लिया करेंगे.
मगर फिर बीच में ही उक्ता
तुम्हे फोन कर लिया करेंगे.

फिर फोन रखके कुछ वक़्त
दीवार ताकते ये सोचा करेंगे,
कब आपके और कॉफ़ी के साथ
बैठ रात एक देर किया करेंगे.

Tuesday, November 8, 2011

मिलो

मिलेंगे सोच जब मिलें, लज्ज़त बातों का कम आता है.
राहें इत्तेफाक़न जब मिलें, मज़ा गुफ्तगू का तब आता है.
रोज़ सुबह सोचता हूँ के, तुमसे कहूं, आज श्याम मिलो.
कहता नहीं पर सोच, के तुम इत्तेफाक़न, आज श्याम मिलो.

Monday, November 7, 2011

नाम ख़ुशी है

लहर किनारे को
प्यार से
साहिल पुकारती है.
कहती है
ये नाम बेहतर है.

साहिल लहर को
प्यार से
मौज पुकारता है
कहता है
ये नाम ख़ुशी है.

Sunday, November 6, 2011

नाराज़गी

क्यों ऐसे उखड़े ख़फ़ा से हो
नाराज़गी की वजह क्या है?
मुझे भी तो कहो के आखिर
नाराज़गी की वजह क्या है.

Saturday, November 5, 2011

चश्मे

अरमान कुछ काँच में ढाले,
जिनके चश्मे बना लिए हैं.
दुनिया सारी अब मुझे, अपने
अरमानों के रंग में दिखती है.

Friday, November 4, 2011

सब सोए हैं

दिमाग, ज़हन, आचार, विचार  
थक हार  के सब जा सोए हैं.
दर्द सा जम गया है हाथों में
के आज कपड़े बहुत धोए हैं.

Thursday, November 3, 2011

मुशायरा

बीती रात का ख्वाब एक मुशायरा थी
तुम्हारे संग बीते पल वहां पर शायर थे.
हर नज़्म हर एक लम्हे का वाक़िया थी,
सुनने वाले सिर्फ, मैं और मेरे जज़्बात थे.



Wednesday, November 2, 2011

एहसान

नज़र भर देख चला जाउँगा,
एक बार खिड़की पे तो आओ.
मुझे देख न सही, कमस्कम
इस सुहानी श्याम पे मुस्काओ.

तुम शायद जानो न जानो,
तुम्हारा शहर छोड़ रहा हूँ.
मुझे यहाँ बांधे रखें जो वो
कच्चे-पक्के धागे तोड़ रहा हूँ.

एक एक कर सारे धागे तोड़े
बस ये आखरी टूटता नहीं.
के आज जाकर कह दूं तुम्हे,
सोचा कई बार, पर हुआ नहीं.

खैर, अब जो जा रहा हूँ मैं तो
कहके भी तुमसे क्या होगा.
बस एक बार देख मुस्कुरा दो  
तो तुम्हारा बड़ा एहसान होगा.




Tuesday, November 1, 2011

बात, वो कल की है

एक बात कहूं तुमसे,
बात मगर कल की है

खैर जाने ही दो उसे,
बात तो ये कल की है.

"अब कह भी दो, तो क्या
गर बात वो कल की है."

अब आज कहके क्या फायदा
बात तो आखिर कल की है.

"यूँ छेड़ के बात न छोड़ो,
बात भले वो कल की है."

"कुछ तो ज़हन में है तुम्हारे, बस
कह दो  वो बात जो कल की है"

ये आखें, हँसी, ज़िद, ये गुस्सा सब 
भा गए, पर वो बात कल की है. 

आगे की फिर कभी कहूँगा,
वो बात भी फिर कल की है.