Wednesday, January 30, 2013

कम कहा करता हूँ

वो अक्सर कहती हैं,
अक्सर क्या, हमेशा कहती हैं
के मैं बड़ा कम कहता हूँ।

पर लहज़ा शिकायती नहीं होता
उल्टे बड़ी दिल्लगी से कहती हैं-
"भई  ये हमारे, बड़ा ही कम कहते हैं।"
कोई ग़र वजह पूछ ले तो
जवाब उनके मूड के चलते
कभी कुछ, कभी कुछ होता है।

शरारत सूझ रही हो तो-
"मैं कुछ कहने दूँ , तब न।"
जो चिड़चिड़ी सी हो तो-
"ये न समझना के मैं कहने नहीं देती।"
कुछ उदास सी हो ग़र-
"क्या पता, कभी कुछ कहा नहीं।"
और खुद न ख्वास्ता जो ग़ुस्से में हों-
"न कहें तो न सही, मेरी बला से।"

खैर, ये तमाम जवादात तो
वो दिया करती थी, औरों को।
मैंने अक्सर ग़ोर किया था के
ये सवाल वो खुद भी
मुझसे करना चाहती थी।
और आख़िर आज कर ही लिया-
"अब बताओ भी, इतना कम क्यों कहते हो?"

ज़रा मुस्कुराते, उन पूछती आँखों में
देखते हुए मैंने कहा-
"आपके वो जवाब जो सुनने होते हैं,
बस, इसीलिए कम कहा करता हूँ।"

Thursday, January 24, 2013

पृथक

छोर पे स्थित तटस्थ निशब्द स्तब्ध सा 
मैंने अपने प्रतिबिम्ब को मुझसे पृथक हो 
निरंतर निर्मम प्रवाह में बह जाते देखा।
ठीक उसी रूप से जैसे अपनी छाया को 
प्रातः उषाकिरण में रिक्त धरा पटल से 
निरंतर निर्मम प्रवाह में उड़ जाते देखा।
अब केवल इस नश्वर शरीर को ढोए 
थकी आत्मा जीवन छोर पर खड़ी है।
अब जाने कब उसे शरीर से पृथक हो 
ये छोर छोड़े अनंत में विलीन देखूंगा।

Saturday, January 19, 2013

सवाल

जिस्म कैद है इस रूह के शिकंजे में,
वो बेदर्द इसे तिल-तिल घोंट,
न मरने देती है न मारती ही है।
जाने क्या दुशमनी निकाल रही है।
कभी यूँ पँजे कसती है गर्दन पर
के जिस्म तड़प के दुआ करता है-
बस अब साँस छूट ही जाए।

रूह चालसाज़ मगर बाँध लेती है
जिस्म को आखरी साँस से।
बौखलाई आँखों से देख रहा है जिस्म-
वक़्त पे घिस-घिस के रूह
अपने नाखून तेज़ कर रही है।
आज फिर शायद सोच की तहें
कुरेद-कुरेद कर यादें उधाड़ेगी।
उधेड़ ही दे सभी एहसास और
डाल दे उस धौंकते अलाव में
के हमेशा के लिए राख हो जाएँ वो,
जिस्म महसूस न कर पाए कुछ और।

रूह मगर सर्द हैवानियत से मुस्कुराते
हर उधड़े एहसास, हर कुरेदी याद को
अलाव की लाल झुंझलाती रौशनी में
एक एक कर कतार में, उस कांपते
जिस्म के सामने नंगा सजाती रहती है।
वो आँखे मूंदे भी तो राहत नहीं मिलती;
वो धधकता मंज़र बंद पलकों के पार
खुद ब खुद उतर आता था।

अपने पंजों की हर गिरफ़्त, हर घोंट,
अपनी नाखूनों की हर चोट, उन
हैवानी होंठों की हर सर्द मुस्कान के बीच
जिस्म की हर पूछती चीख के बीच
रूह अब तक ख़ामोश थी।

जिस्म के हर सवाल, हर चीख,
हर दुहाई का जवाब रूह अब तक
सिर्फ एक ठंडी नज़र से देती थी।
आखरी साँस के फंदे से लटकते
जिस्म को रूह ने फिर देर तक घूरा
और उसके सभी सवालों के जवाब में
सिर्फ एक सवाल किया -

क्यों जनाब,
आईना देखते इतनी तकलीफ होती है?





Friday, January 4, 2013

रास्तों के ख़याल

पैदल चलने का बड़ा शौक़
हुआ करता था कभी।
कहने सुनने को तो ख़ैर,
अब भी है।
एक अर्सा  हो गया मगर
पैदल सैर को गए हुए।
ये शौक़ कोई कसरती नहीं था,
बल्कि ज़हनी था।

तड़के सुबह,
पैदल रास्ते किसी राग के
बड़े ख़याल से लगते थे।
एक एक सुर की तरह
हर मोड़ हर नुक्कड़
अपनी अपनी पहचान लिए
एक एक कर मुखातिब होता था।

कोई मोड़ कहीं भा गया तो
सुरों की कई पेंचें लड़ जातीं।
किसी नुक्कड़ पर कभी,
मद्धम, पंचम से दो बातें हो जातीं।
किसी लय से चढ़ते उतरते
घुमते फिरते पैदल रास्ते पर
ज़िन्दगी अपने ही तालों पर थिरकती-
कहीं इस थाप, कहीं उस थाप।

चढ़ते सूरज के साथ जब मैं
वापसी को पलटता था,
वही पैदल रास्ता अब
उस राग के छोटे ख़याल सा जान पड़ता।
बढ़ती चहल-पहल के साथ साथ
सुर, ताल, ले सब द्रुत गति के होने लगते।
मोड़ों पर सुर तेज़ तानों में गुज़रते,
और नुक्कड़ों पर आलाप दौड़ते दीखते।

इन सब से होते गुज़रते ज्यूँ
अपने दरवाज़े तक पहुँचता,
चिटकनी की आवाज़ पर
तडके सुबह के उस
पैदल रास्ते के ख़याल का,
आखरी सुर पूरा सठीक बैठता।

पैदल चलने का शौक़
अब भी है,
उन तडके सुबह के रास्तों के ख़याल
अब भी हैं।

Wednesday, December 5, 2012

अर्ज़ी

आज ज़िन्दगी से अर्ज़ी आई है,
कल के दिन की छुट्टी मांगी है।
कहती है, एक पुरानी याद है-
कल आने वाली है इक उम्र बाद।
यादों की भीड़ में उस एक को
खोजते पहचानते वक़्त लगेगा।
मिलते ही उसका हाथ पकड़
उसी गुज़रे लम्हे के खँडहर में ले जाऊंगा
जहाँ वो पिछली बार छोड़ गयी थी मुझे।

शायद उसके लौटने से वो खँडहर फिर
चंद लम्हों के लिए आबाद हो जाये।

Sunday, November 25, 2012

पैदल राहें

पहियों तले रास्ते
अक्सर भागते फिसलते हैं,
बस धुंदली लकीरें दिखती हैं।

पैदल मगर,
रास्ते अपना नाम बता
हमारे साथ चल पड़ते हैं।

रास्तों से पहचान हो जाती है।


रास्कल

वो आई नहीं अब तक,
बात जाने की कर रही है।
मैं इंतज़ार मैं बैठा,
उसके मेसज पढ़ रहा हूँ।

"बड़ी देर हो गई न?"

"कब से बैठे हो?"

"बस रस्ते में हूँ"

"क्या करूँ, उलझन थी,
कौन सी साढ़ी पहनूँ ?"

"हरी और बसंती
वाली पहनी है आखिर।"

"तुम्हे अच्छी लगेगी न?"

"6 बजे जाना है,
माँ घर पर हैं आज।"

"देर हुई तो शक करेंगी!"

"हमें आज चिक्की बनानी है।"

"कल खिलाऊँगी, मेरे
हाथ का बना पहली बार चखोगे।"

"रास्कल, दीवार पर बैठे हो,
मैं साढ़ी में कैसे बैठूंगी ?"

हसते-हसते दीवार से उतरा,
घड़ी 6 से कुछ 5 मिनट पीछे थी।
साढ़ी में संजीदा लगती थी,
पर ज्यों मुस्कुराती,
संजीदगी शरारत बन जाती थी।
उसकी वो बदमाश शर्म,
बड़ी नायाब थी।

मुझे आता देख, वहीं
लॉन पर बैठ गई।
लगा, हरी घाँस के बीच,
बसंती फूल खिल गया हो।
मेरे बैठते ही मेरा हाथ
कसके थाम लिया।
मेरी उँगलियों पे
अपनी उँगलियाँ फेरते कहा-

"रास्कल!
 चलो मुझे अब घर छोड़ आओ।"

सुबह से नींद


मेरी आँखों में सुबह से नींद है.
कल रात जो वो रास्ता भूली,
आज जाके अपने पते पहुंची है.
अब ऐसी बेवक्त मेहमान ये,
न रोकी जाती न छोड़ी ही.
इस बार,
हाथ उसके टाइम टेबल थमा दूंगा.
इस उम्मीद से,
की फिर कभी न कहना पड़े,
मेरी आँखों में सुबह से नींद है.

ख्वाब का पेड़

रात एक बार इक ख्वाब से गुज़रते 
मैदान में उस ख्वाब का बीज बोया था।
अगली कई रातों तक ख्वाब बरसते रहे,
आज यूँ ही टहलते-टहलते मैदान में 
इक नया पेड़ दिखा, जिसे पहले न देखा था।
सोचा दम भर इस नई छाँव में बैठ फिर 
घर की ओर मुड़ जाऊंगा।
कब आँख लगी, पता ही न चला।

ख्वाब में देखा मेरे बीज का पेड़ बन गया है,
और उसकी छाँव में लेटे,
मैं फिर ख्वाब देख रहा हूँ। 

Monday, November 5, 2012

अलार्म

कल रात ख्वाब देखते देखते
अचानक छींक आ गई,
ख्याल चन्द उस ख्वाब के
अँधेरे में बिखर गए।
वो कुछ सुहाना सा
जान पड़ा था ख्वाब,
सो इक मोम बत्ती लिए
अँधेरे टटोलने निकल पड़ा।
ज्यूं ज्यूं टुकड़े मिलते गए,
ख्वाब मैं अपना जोड़ता गया।
आखरी टुकड़ा बस जोड़ा ही था,
कबख्त!
सुबह छः बजे का अलार्म बज गया।
नींद चौंक कुछ यूँ खुली के
रात भर बटोरा ख्वाब वो
फिर टूटके बिखर गया।

Wednesday, October 31, 2012

पैग़ाम

आँखों से पैग़ाम लिखा करती थी
काजल की स्याही में नज़र डुबोके।


पलकें झपक के वो भेज देती थी
बिना पतों के वो पैगाम- क्या जाने
किसे मिले वो, कौन उन्हें पढ़ता हो।
अपना पता नहीं लिखती थी मगर,
जवाब का इंतज़ार ज़रूर करती थी।


आँखों से पैग़ाम लिखा करती थी
काजल की स्याही में नज़र डुबोके।


नेरुदा की इक नज़्म पर ग़ौर करते
बुकस्टोर के इक कोने में बैठा, यूँ ही  
दो बच्चियों को सुन रहा था बात करते
ऑस्टेन और ‘यू’एव गोट मैल’ पर जब,
ग़ालिबन दिल पर दस्तक हुई; मैंने देखा


आँखों से पैग़ाम लिख भेजा था इक उसने काजल की स्याही में अपनी नज़र डुबोके।



Friday, October 26, 2012

शिकायत

रात फिर जागते कट रही थी,
किताबें भी मुझसे ऊब चुकीं थी,
कलम मेज़ पर सुस्ता रही थी,
बालकनी के खुले दरवाज़े से 
चाँदनी झिझकती झाँक रही थी।
कुर्सी ज़रा पीछे खुकाए बहार देखा  
चाँद मूंह सिकोड़े पीला पड़ा हुआ था।
"क्यूँ  ऐसे जागते रहते हो, तुम्हे यूँ 
देख रात मुझे बुरे सपने आते हैं।"

Thursday, October 25, 2012

इन्तेहा

एक कंकड़ उछाल फेंका है सोच
चोट इन्तेहा को जा लगेगी।
वो वापस लौट मेरे माथे को लगा
देखा इन्तेहा वहाँ मुस्काने लगी।

Tuesday, October 16, 2012

बित्ता-बित्ता

हर अमावास से अमावास तक,
वो बैठा रात की चादर काढ़ता है।
तारों के छींटों के आगे हर रोज़,
बित्ता-बित्ता भर पूरा चाँद काढ़ता  है।

Thursday, August 16, 2012

फ़िर्दौसी-फ़िरोज़ी

अटारी की खिड़की की देहली पे
एक तख्ती लगा उस पर चढ़,
उछल-उछल कोशिश करता हूँ
के किसी रोज़ उँगलियाँ मेरी,
फ़िर्दौस की फ़िरोज़ी धूल छू आयें।
मेरा मन थका उदास सा है,
उस पर ज़रा वो धूल मल लूं के,
वो भी ज़रा उछल
फ़िर्दौसी-फ़िरोज़ी हो जाए।

अटारी- atticदेहली- window sillतख्ती- wooden plankफ़िर्दौस- heavens/ garden in paradiseफ़िरोज़ी- turquoise