Sunday, November 27, 2011

बेवक्ती नींद

पिछले कुछ इतवारों जैसे
इस इतवार की शुरुआत भी
लगभग दोपहर से हुई है.
मेरी बेवक्ती नींद लेकिन
कुछ और सोना चाहती है.
इसके भी बड़े नखरे हैं.
रात देर से आना और
देर सुबह तक न जाना.
बिलकुल उस माशूका सी
जिससे न निभाया जाये
न जिसको छोड़ा ही जाये.
कमबख्त कुछ यूँ बिगड़ी है
लाख़ सुधारते नहीं सुधरती.
अब जो ग़लती की है सो
भुगतना भी खुद ही को है.
पर इतवार है आज आखिर,
तो इसमें हर्ज़ ही क्या है के
वो कुछ और सोना चाहती है.


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