Tuesday, August 20, 2013

लकीरें

चंद लकीरें खेंची थीं ये सोचकर
तुम्हारी तस्वीर बनाऊंगा आज 

तस्वीर तो बनी नहीं, नज़्म लिख गई।  

Thursday, August 15, 2013

फ़िल्म

हाथ कुछ यूँ पकड़ रखा था मेरा
जैसे, बस छोड़ ही जाउँगा तुम्हे

डरो मत, बस फ़िल्म ही तो है। 

Wednesday, August 14, 2013

कार्ड

पलटते ज़र्द से पन्नों से आज
इक पुरानी नज़्म गिर गई है

कार्ड था तुम्हारा, मेरा बुकमार्क। 

Tuesday, August 13, 2013

ख़त

इतवार की दोपहर में
बेवक्त चाय का ज़ायका

माज़ी से ख़त आया है आज। 

Monday, August 12, 2013

शक़

आँखों ने शक़ से देखा था
के कौन आई है मेरे साथ

पाज़ेब हैं, ज़रा पहनो तो। 

Sunday, August 11, 2013

छाता

सीली दीवार पे लटकता
भीगी खिड़की का टुकड़ा 

छाता रख लो, बरसात है। 

Hanging upon a damp wall,
A piece of a soaked window,

Keep an umbrella, its rainy.

Saturday, August 10, 2013

शायद

बदली सी ज़ुल्फें
झलक भर गाल,

यूँ मुस्कुराई थी!

Black cloud like hair,
Glimpse, of a dimple,

How you had smiled! 

Saturday, August 3, 2013

मोमबत्तियाँ

अँधेरा पसन्द नहीं था ज़रा भी,
मगर अक्सर
बुझा दिया करती थी घर की बत्तियाँ ।
एक एक कर हर कमरे में फिर
जलाया करती थी छोटी बड़ी मोमबत्तियाँ ।
बड़ा शौक़ था मोमबत्तियों का-
कहती थी उनकी लौ दिल सी धड़कती है, ज़िन्दा है
उन बिजली के ठंडे लाटुओं सी बेजान नहीं।

अपनी ज़िन्दा रौशनियों सी घिरी
आईने के सामने अपने बाल बनाया करती थी।
मैं अक्सर छुप छुप के देखा करता था,
तस्वीरें उतारा करता था।
साँझ सी घुलती रौशनी में
पूरा चाँद जैसे बरसाती घटाओं को
अपनी उँगलियों से तार कर रहा हो।

मेज़ की मोमबत्तियों की मद्धम लौ में
फर्श पे कोहनियों के बल लेटे,
अपनी किताबें गुनगुनाया करती थी।
मैं हमेशा टोकता-
'यूँ पढ़ोगी तो चश्मे चढ़ जाएँगे !'
सुनकर मेरा  चश्मा नाक पर ताने
मुझ पर जीभ चिढ़ाया करती थी।

छुट्टी के रोज़ कभी
हॉल का फ़र्नीचर हटा
कुकर की सीटियों के बीच मुझे
सालसा सिखाने की कोशिश करती।
चिड़कर फिर मेरे अनाड़ीपन से
ग़ुस्से से कुछ मोमबत्तियाँ
बुझा दिया करती।

मोमबत्तियाँ वो सारी अब
सिर्फ तस्वीरों में ही रौशन हैं-
दीवारों पर, मेज़ों पर,
खिड़कियों की चौखट पर,
दराज़ों, क़िताबों में
मेरे बटुए में।
कभी खाली हॉल में सालसा
कभी मेरे चश्मे में शरारत
कभी क़िताबों में नज़्में
तो कभी आईने के चेहरे
अब भी यादों में
टिमटिमा से जाते हैं।

तनहा से इस घर में
अब बिजली ही रौशन होती है
बेजान डंडे लाटुओं में।
मोमबत्तियों में यादें कहीं
पिघल के धुआँ न हो जाएँ।


Wednesday, July 24, 2013

साँझी भोर

भोर का आसमान आज
देर साँझ का सा लगता था,
कुछ वैसा ही
जैसा कल श्याम को देखा था
रात जागते कटी थी पूरी और
सुबह यूँ लगा था जैसे वक़्त
रात भर थम गया था-
थक के चलते-चलते शायद
कहीं सो गया था.
मैं घर से निकला था जब आज,
वक़्त ने भी तभी
आँखें खोली थी अपनी
और सुबह आज की
उसी साँझ सी लगी थी
जो कल
घर लौटने से पहले देखी थी.

Sunday, July 21, 2013

नई बात


कुछ अर्से से टटोल रहा हूँ 
ज़हन की संकरी गलियों को। 
कभी रख के भूल गया हूँ 
या छुपे बैठे हों कोनों में वो 
ख़याल जिन्हें शायद ज़ुबाँ
ढाल ले अल्फाज़ों में,
भले छोटी सी ही सही,
पर आज 
इक नई बात कहूँ तुमसे।

Wednesday, July 17, 2013

गोद

भीगा थका, बरसात में चलता घर पहुँचा 
नींद छाता लिए दरवाज़े पर खड़ी थी।
"थक गए होगे, आओ अपनी गोद में सुला दूँ।"

Wednesday, April 24, 2013

तस्वीर सा

इक तस्वीर सा देखा था तुम्हे,
झलक भर ही दिखी थी तुम।
और इक तस्वीर सी ही फिर
चली गई थी तुम, माज़ी के
उन खानों में जहाँ मीठी
खुशगवार यादें रखीं थीं।
कभी किसी पल का ग़र कोई
धक्का सा लगता तो
उन में से कुछ यादें सरक कर
आज में छिटक जातीं- जैसे
क़िताब में दबाई कोई
पुरानी तस्वीर हो।
ठीक वैसे ही माज़ी से मेरे
अचानक तस्वीर सी आ बैठी हो
मेरे सामने वाली टेबल पे-
चाय के गर्म प्याले के साथ अकेली,
एक वर्जिनिया वुल्फ का नॉवेल लिए।
मैं कल के मैच के बारे में पढ़ रहा था
मगर और उस पर गौर न होता था।
अखबार को मोड़ कर परे रखा
और तुम्हे बस देख ही रहा था के
तुम अपनी किताब और चाय लिए
मेरी टेबल पर आ बैठी।
तिर्छी नज़रों से मेरी सकपकाहट
पे मुस्कुराते पुछा-

"क्यों जनाब! वो तस्वीर याद है?" 

Sunday, April 14, 2013

गर्मियाँ


भाप सा पसीना,
सुराही में पानी।

तीन और महीने।



Tuesday, April 2, 2013

आखिरी

गुज़रती रात को थाम लिया था
अपने लिपटे हुए जिस्मों के बीच,
सबसे दूर छिपकर सावन की सीली,
अलसाई सी चाँदनी में।
भीगी घाँस की महक में
तेज़ साँसें घुल गईं थीं,
बदन वो ज़मीन से सब्ज़,
मटियाले से हो गए थे।
हथेलियाँ चिपक सी
उंगलियाँ साथ बुन सी गईं थीं,
आँखें बोझल, नम, छलक गईं थीं,
उदास वो चेहरे भिगोते हुए।

आखिरी रात थी वो उनकी,
बस, आखिरी कुछ लम्हे।


Wednesday, March 27, 2013

मिली

मेरी आँखों पे पट्टी बाँधे
अपने साथ खींच ले आई,
और बैठा दिया था तुमने
उस पुरानी सी कुर्सी पर।
वो कमरा था के आँगन,
कमरा सा ही लगा था
पर घर किसका था वो
देर तक जान नहीं पाया।
इतवार की सुबह थी और
शायद दस बज रहे थे,
आवाजें घरेलु इतवारों सी,
रेडियो पे फ़िल्मी गाने,
रसोई में छौंके की सर्राहट,
अखबार के पलटते पन्ने,
और पड़ोस के बच्चों का शोर।
शायद मेरा ही घर था, पर
नहीं, कुछ अलग सा था।
तुमने बिठाते वक़्त हौले से
अपनी ऊँगली मेरे होंठों पर रख,
हँसी दबाते कहा था-
"श्श! आवाज़ न करना, न हिलना!"
फिर हल्के से चूमके माथे को,
नटखट चूड़ियाँ खनकाती तुम,
खिलखिलाते हुए भाग गई थी।
खुद को अकेला समझ मैं,
पट्टी खोलने लगा तो मेरा,
हाथ झटकते एक बच्ची बोली,
"बदमाशी नहीं! मना है न?"
उस बच्ची ने यों कहा था के
माँ की बचपन की डाँट याद आ गई।
सोचते उलझते बस बैठा रहा,
ज़रा भी हिलता तो डाँट पड़ जाती।
चाय की खुशबु के बीच फिर,
एक साथ कई आवाजें आईं,
हँसी-ठहाकों पायल-चूड़ियों के बीच,
सरकते फर्नीचर और गिलास।
बच्ची ने मेरे कान में आ धमकाया-
"हिले या बोले तो अच्छा नहीं होगा!"
और आकर मेरी गोद में बैठ गई।
तुम जाने कहाँ चली गई थी?

"अरे! भई किसे बाँध रखा है?"
मेरे पसीने छूट गए-
आवाज़ तो पिताजी की थी।
"कोई नई शरारत लगती है।"
माँ भी!
"अरे ये कौन है छुटकी?"
बेड़ा गर्क, तुम्हारे बाबूजी!
मह बोल न पडूँ सोचके,
गोद बैठी छुटकी ने मेरे
मूँह पर हाथ रख दिया था।
"हे भगवान्! मिली! ओ मिली!"
रही सही कसर भी निकल गई,
तुम्हारी अम्मा जी भी आ गईं।

छुटकी खिलखिला रही थी,
पर मेरा मूँह नहीं छोड़ा था।
मोगरा और चम्पा की महक
और रेशमी साड़ी की आहट
के बीच सब चुप हो गए थे।
माँ पिताजी ने आशीर्वाद दीए
और अम्मा बाबूजी, चौंक के
सिवाए 'मिली' और 'साड़ी' के
और कुछ न कह सके।
छुटकी मेरी गोद से उतर गई
और तुमने मेरे पीछे से आकर
मेरी पट्टी खोल दी और कहा-
"आँखें मत खोलना अभी"
फिर भाग कर मेरे सामने आई
"हाँ, अब खोलो।"
हमेशा जीन्स-टॉप पहनने वाली,
आज अचानक रेशमी साड़ी में लिपटी,
बाल बनाए, फूलों से सजाए,
आँखों में काजल लगाए,
पलकें झुकाए शर्माती हुई सी
सामने खड़ी थी।
लफ्ज़ क्या,
मेरी आवाज़ ही गुम हो गई थी।
इस से पहले की कोई कुछ कहता,
तुमने मेरी आँखों में देखा और
इक शरारती शर्म से मुस्कुराते हुए पुछा,

"मुझ से शादी करोगे?"