Tuesday, March 26, 2013

शब्द

सूरज सी चमकती,
अमावस सी काली,

तुम्हारी बोलती आँखें।






Monday, March 25, 2013

बिन मौसम

इक श्याम नए दो बादल बने,
आँख खुलते ही उनकी नज़र,
उगते पूरे चाँद पर पड़ी, बस
मुहब्बत हो गई।
आसमाँ के अपने अपने कोनों से
वे दोनों बेक़ाबू से दौड़ पड़े,
के आग़ोश में ले लें अपने महबूब को।
निगाहें सिर्फ़ मंज़िल पर थीं,
इक दूजे को आमने-सामने न देखा
और टकरा गए।

यहाँ ज़मीन पर सब हैरान हुए
के अचानक ये बिन मौसम के
बिजली बारिश क्यों हो गई?

Sunday, March 17, 2013

मैं पत्थर क्यों?

"पत्थर की हो गई है,
एक आँसू ही बहा दे।"
यही कहा करते थे सब,
कोई तरस खाके तो 
कोई ताना मारते कहता था।

ये मगर कोई नहीं जानता था 
के उसकी आँखें 
हमेशा से बाँझ न थी।
पहले तो ख़ुशी में भी 
खूब छलक पडतीं थीं।

इक रोज़ वो चला गया।
क्यों, कहाँ- पता नहीं;
न कोई बात, न चिट्ठी 
न अलविदा ही-
बस चला गया।

समझ कोशिशों से दूर 
और सुकून नाम को भी नहीं।
सब्र, इख्तियार, भरोसा 
एक-एक कर 
फिकरों, तंज़ ओ तानों  
और ज़माने की खोखली कहानियों 
की ठोकर में सब ढेह गए और 
आँखों के बाँध कुछ यूँ टूटे 
के सब बह के बंजर छूट गया।

हाँ,
वो पत्थर ही हो गई है,
बाहर से वो पत्थर ही हो गयी है।
अंतर उसका अब 
एक उफान पे है।

"बिना सोचे, बिना कहे वो गया,
क्या उसके दिल ने उसे नहीं रोका
बेदर्द वो, बेरहम वो, बेजज़्बा वो 
तो मैं पत्थर क्यों?
वो प्यार, वो वक़्त,
वो यादें, वो हँसी सब 
उसने भुलाए
तो मैं पत्थर क्यों?
मैंने तो बस प्यार किया था,
अपनी हँसी बाँटी थी,
कुछ माँगा नहीं था।
फिर ज़िल्लत मुझे क्यों मिले? 
हाँ मेरी आँखे बाँझ हो गईं हैं,
पर सिर्फ उसके लिए।
एक कतरा भी उसपे 
अब बर्बाद न होगा।
जो पत्थर का लोगों ने
मुझे बना दिया है उसे 
तराश के अब बहार 
मैं नई सी बन निकलूँगी।
ज़माने का पुराना शीशा तोड़ 
खुद का इक नया बनवाया है,
अपनी नई काया को 
अब बस उसी में देखूँगी।"

Thursday, March 14, 2013

बिन्दी


इक बर्फ के गर्म टुकड़े सा 
चाँद रात को टपक रहा था,
इक बूँद मैंने भी बटोर ली है,
आओ तुम्हारे माथे पर सजा दूँ।

Monday, March 11, 2013

सॉरी

वो बरसाती हवा जो झोंके से छूँ गयी काँधे को कल श्याम 

तुम उतर रही थी सीढ़ियाँ अपने घर की जब उस मई की रोज़ 
और मैं अखबार लौटाने तुम्हारे पापा को ऊपर आ रहा था; 
भीगी जुल्फें अपनी झटकी थी तुमने, हिन्ना सी महकती 
कुछ छींटे गिरी थीं काँधे पे मेरे जिन्हें लहराके गुज़रते 
तुम्हारे उस पीले दुप्पटे ने सहलाके पोंछ लिया था।
मैं पलटा और तुम्हे भी पलटते देखा तभी और दोनों ही ने 
एक साथ ही कहा था- "सॉरी! "

वो बरसाती हवा जो झोंके से छूँ गयी काँधे को कल श्याम 
याद दिला गयी वो हिन्ना सी महकती उस रोज़ की सॉरी।

Saturday, March 2, 2013

पत्ता

आँखें मूँदे, 
होंठों पर चुप्पी साधे, 
हाथ बाजू में बाँधे,
खुद को एक पत्ता समझे मैं, 
चौराहे सी आँधी में खड़ा हूँ।
कब कोई हवा किस दिशा की 
पकड़े अपने साथ ले जाये,
 छोड़ दे कहीं और।
अब बर्दाश्त नहीं होता 
यहाँ बेवजह जुड़े रहना 
इस ठहरी सी ज़िन्दगी से।

मुझे सुन लो

चंद लफ़्ज़ों की कहानी हूँ मैं 
मुझे दास्ताँ बनने का शौक़ नहीं।
चंद मिन्टों की महमाँ हूँ में 
मुझे लम्बी उम्र का ख़्वाब नहीं।

बस ज़रा सा ठहर जाओ,
मुझे सुन लो।

Saturday, February 23, 2013

सिक्का

इक आखिरी सिक्का बचा था जेब में।
किस्मत परखने को अपनी, उसे
आसमान में उछाल दिया।

अपनी भी क्या किस्मत है देखिये,
जेबका आखिरी सिक्का भी आसमान पे
चिपक के आज खुद को चाँद कहता है।                      

Thursday, February 7, 2013

जाने कब?

कुछ रोज़ से यूँ लग रहा है
मैं लगातार एक सीढ़ी चढ़ रहा हूँ,
एक ऐसी सीढ़ी जिसका छोर
कभी गहरे अँधेरे
कभी चुंधियाते उजाले में
गुम सा रहता है।
कभी ऊपर उठने का
झाँसा सा हो जाता है,
कभी यूँ लगता है वो सीढ़ी
मैं ज्यूँ-ज्यूँ चढ़ता जाता हूँ
त्यूँ-त्यूँ नीचे उतरती जाती है।
न जाने कब ऊपर पहुँचूँगा
क्या पता पहुँचूँ भी के नहीं,
या कुछ है भी ऊपर
नहीं पता।
किसी मशीन से,
क़दम आप ही चलते जा रहे हैं-
न सोच के बस में
न ही जज़्बातों के काबू में।
ऊबने लगा हूँ,
थकने लगा हूँ अब
इस मशीनी, बेजज़्बा
अन्धी चढ़ाई से।
जाने कब पहुँचूँगा?

जाने कब?


Monday, February 4, 2013

टाइम क्या हुआ?

मुझे याद नहीं कब
मुझे यद् नहीं जब
मुझे याद नहीं तब
मुझे याद नहीं अब

के आप से पहली बार बात हुई थी।
जो याद है वो ये के,
वहाँ आप थीं,
वहीँ मैं था
भरी भीड़ में अकेला
और आपने
काँधे पे थपकी देकर
पीछे से पुछा था-
"मुआफ़ किजेगा, टाइम क्या हुआ?"


Friday, February 1, 2013

संतरे की डली सा

कच्ची रात का उगता
संतरे की डली सा वो
आधा चाँद।
आओ तुम्हे काँधों पे उठा लूँ
तुम चुपके से चुरा लेना उसे
रात की हथेली से।
आधी पहले तुम खा लेना
बाकी आधी मैं खिला दूँगा।
उठा लूँगा काँधों पे एक बार फिर,
स्याह रात के आसमाँ के सामने
तुम्हारा ये मुस्कुराता चेहरा
के संतरे की डली सा वो
आधा चाँद भी
पूरा हुआ नज़र आएगा।

Wednesday, January 30, 2013

परिचय


उनसे कदाचित परिचित हैं हम,
परन्तु जब परिचित के प्रिय,
परिचित से परिचय करवाएं,
तो परिचित नव परिचित हो जाता है.

कम कहा करता हूँ

वो अक्सर कहती हैं,
अक्सर क्या, हमेशा कहती हैं
के मैं बड़ा कम कहता हूँ।

पर लहज़ा शिकायती नहीं होता
उल्टे बड़ी दिल्लगी से कहती हैं-
"भई  ये हमारे, बड़ा ही कम कहते हैं।"
कोई ग़र वजह पूछ ले तो
जवाब उनके मूड के चलते
कभी कुछ, कभी कुछ होता है।

शरारत सूझ रही हो तो-
"मैं कुछ कहने दूँ , तब न।"
जो चिड़चिड़ी सी हो तो-
"ये न समझना के मैं कहने नहीं देती।"
कुछ उदास सी हो ग़र-
"क्या पता, कभी कुछ कहा नहीं।"
और खुद न ख्वास्ता जो ग़ुस्से में हों-
"न कहें तो न सही, मेरी बला से।"

खैर, ये तमाम जवादात तो
वो दिया करती थी, औरों को।
मैंने अक्सर ग़ोर किया था के
ये सवाल वो खुद भी
मुझसे करना चाहती थी।
और आख़िर आज कर ही लिया-
"अब बताओ भी, इतना कम क्यों कहते हो?"

ज़रा मुस्कुराते, उन पूछती आँखों में
देखते हुए मैंने कहा-
"आपके वो जवाब जो सुनने होते हैं,
बस, इसीलिए कम कहा करता हूँ।"

Thursday, January 24, 2013

पृथक

छोर पे स्थित तटस्थ निशब्द स्तब्ध सा 
मैंने अपने प्रतिबिम्ब को मुझसे पृथक हो 
निरंतर निर्मम प्रवाह में बह जाते देखा।
ठीक उसी रूप से जैसे अपनी छाया को 
प्रातः उषाकिरण में रिक्त धरा पटल से 
निरंतर निर्मम प्रवाह में उड़ जाते देखा।
अब केवल इस नश्वर शरीर को ढोए 
थकी आत्मा जीवन छोर पर खड़ी है।
अब जाने कब उसे शरीर से पृथक हो 
ये छोर छोड़े अनंत में विलीन देखूंगा।

Saturday, January 19, 2013

सवाल

जिस्म कैद है इस रूह के शिकंजे में,
वो बेदर्द इसे तिल-तिल घोंट,
न मरने देती है न मारती ही है।
जाने क्या दुशमनी निकाल रही है।
कभी यूँ पँजे कसती है गर्दन पर
के जिस्म तड़प के दुआ करता है-
बस अब साँस छूट ही जाए।

रूह चालसाज़ मगर बाँध लेती है
जिस्म को आखरी साँस से।
बौखलाई आँखों से देख रहा है जिस्म-
वक़्त पे घिस-घिस के रूह
अपने नाखून तेज़ कर रही है।
आज फिर शायद सोच की तहें
कुरेद-कुरेद कर यादें उधाड़ेगी।
उधेड़ ही दे सभी एहसास और
डाल दे उस धौंकते अलाव में
के हमेशा के लिए राख हो जाएँ वो,
जिस्म महसूस न कर पाए कुछ और।

रूह मगर सर्द हैवानियत से मुस्कुराते
हर उधड़े एहसास, हर कुरेदी याद को
अलाव की लाल झुंझलाती रौशनी में
एक एक कर कतार में, उस कांपते
जिस्म के सामने नंगा सजाती रहती है।
वो आँखे मूंदे भी तो राहत नहीं मिलती;
वो धधकता मंज़र बंद पलकों के पार
खुद ब खुद उतर आता था।

अपने पंजों की हर गिरफ़्त, हर घोंट,
अपनी नाखूनों की हर चोट, उन
हैवानी होंठों की हर सर्द मुस्कान के बीच
जिस्म की हर पूछती चीख के बीच
रूह अब तक ख़ामोश थी।

जिस्म के हर सवाल, हर चीख,
हर दुहाई का जवाब रूह अब तक
सिर्फ एक ठंडी नज़र से देती थी।
आखरी साँस के फंदे से लटकते
जिस्म को रूह ने फिर देर तक घूरा
और उसके सभी सवालों के जवाब में
सिर्फ एक सवाल किया -

क्यों जनाब,
आईना देखते इतनी तकलीफ होती है?