Monday, June 22, 2015

धूप-छाँव

धूप में घटती छाँव है देखो या
लंबी छाँव में अब धूप खिली है

बालों में सुफ़ैदी बढ़ने लगी है।

Shade in the Sun, Sun in the long Shade,
See, how much Silver's now in my Hair.

Sunday, June 21, 2015

मौसम

आसमान सी आँखें हो गयीं हैं
बादलों की पर ज़रुरत नहीं है

मौसम बदला है बारिशें हैं देखो।

Eyes like the Sky, No need for Clouds,
Season's changed, Look, Rains're here.

Tuesday, June 9, 2015

सूखी

रह रह कर सिसक जाती है नव्ज़
सब अक्सर कोरा ही रह जाता है

अब सूखी क़लम में अलफ़ाज़ कहाँ?

Pulse sobs, all often remains a Blank,
How can there be Words in a Dry Pen?

Thursday, May 21, 2015

चुप सी

मद्धम सा बह निकलता है अचानक
सिसकता सा हिचकता सा वो नमक

बिन कहे आती हैं यादें, भीग जातीं हैं।

Sobbing, Doubtful flows the Salt,
Memories Unannounced, Moisten.

Wednesday, May 13, 2015

बातूनी

बड़ी मेहनत से फिर
थकान बोई थी दिन भर,
चंद झपकियों के अलावा
रात भर कुछ उगा ही नहीं।  


हर कोशिश के बावजूद
साँसे पूरी पड़ती ही नहीं,
रोज़ झाड़ लेता हूँ ज़हन
जमी धूल पर हटती नहीं।


बंद पलकों के बावजूद  
बड़ा कुछ दीखता है,
बंद कानों में भी
वो शोर थमता नहीं।


नींद भी तो बड़ी बातूनी है
बोलती ही रहती है बस  
कमबख़्त,
सोने ज़रा भी देती नहीं ।

Saturday, May 2, 2015

क़त्ल

हर रोज़ चलती है छुरी, हर रोज़ होती है क़त्ल की कोशिशें
हर रोज़ ही छुरी पर धार चढ़ती है, हर रोज़ ही मर जाती है

लहू लुहान हो गई है उम्मीद, कमबख़्त मगर मरती नहीं।

Everyday the blade flashes, everyday a killing is attempted, 
Everyday the blade's honed, yet everyday its edge is dulled,

Bloodied over and over this dogged hope, just refuses to die.



Friday, May 1, 2015

वहम

आने पर इसके लोगों का मानना, दोस्तों का टोकना
और सुनकर चौंक जाना ज़ोर की लगातार छींकों को

वहम से ख़ुश हो जाता हूँ, तुम याद कर रही हो मुझे।

Make Beliefs, Friends taken aback by Loud Sneezes,
I become Happy Imagining, You're Thinking of Me.

Thursday, April 16, 2015

बेनींद

बंद पलकों से भी देख लेता हूँ खुदको
शीशे सी साफ़ तुम्हारी आँखों में रोज़।
अँधेरे में अकेले भीगता है चेहरा मेरा
सिसकता बेनींद इक ख़्वाब भर ही है। 

Wednesday, April 15, 2015

वायलिन

ग़मगीन चंद नोट्स वायलिन के से
सीने की रिसती थकी घुटतीं आँहें हैं

तुम ही बताओ जाना के कैसे भूलूँ।

Bleeding, Tired and Breathless Sighs 
Those Plaintive strains of the Violin

You tell me Dear, How do I Forget?

Monday, April 13, 2015

नज़र अंदाज़

बहार आता है अंदर भी हर कभी कभी
पर नज़र अंदाज़ ही होकर रह जाता है

और आती भी तो नहीं तुम आज कल।

The Within  Emerges now & then, but Ignored,
You too, no longer Visit Anymore, as You Did.

Saturday, April 4, 2015

कहो कैसे?

आसमान जैसे था ही नहीं आज रात
अपनी ही रौशनी में तैर रहा था चाँद

तुम्हारा रौशन चेहरा, कहो कैसे भूलूँ?

It Floated in it's own Aura, The Moon; was no Sky,
How am I to Forget your Glowing Visage, Tell Me?

Friday, April 3, 2015

हर लम्हा इक

भीड़ में भी अकेला ही लगता है,
मुर्दा उम्मीद में जलता रहता हूँ,

ज़हन से सवाल नहीं बुझता है
मिले इक ख़ता ढूँढता रहता हूँ,

पल भर को भी सुकूं न रहता है
ज़िंदा यादें काट काट फेंकता हूँ,

सूख कर आँखे नमक हो गईं हैं
आजाए नींद बस राह तकता हूँ,

साँसे तो पहले ही सिक्कों से हैं
बस ख़त्म हो सो खर्च करता हूँ,

वीरां सीने में बस चंद धड़कनें हैं
थम जाएँ बस इंतज़ार करता हूँ,

हर लम्हा इक मौत जीता हूँ मैं
हर लम्हा इक ज़िंदगी मरता हूँ। 

Tuesday, March 31, 2015

पुकार

आँखें सिकुड़ गईं हैं उफ़क़ की ओर ताक़ते रहते
साँसे ख़र्च हो चुकीं हैं उस पुकार की ओर चलते

आवाज़ आख़िर तुम्हारी है, मैं कैसे रुक जाऊँ?

Narrowed Eyes, Spent Breath Heeding the Call,
How am I to Stop then, when the Voice is Yours?

Wednesday, March 25, 2015

रुआँ रुआँ

सुलगते टार की फ़र्श, ख़ामोश अंधेरा धुआँ
काँटों से छन्नी जिस्म, चीखता रुआँ रुआँ

सुनता हूँ तुम्हे हमेशा, पर पहुँच नहीं पाता।

Screaming Pores of the Thorn Shredded Body
Through Mute Smoke on Scorching Tar Floor

I Hear You always, but just Can't Reach You.

Sunday, March 22, 2015

क्यों लिखते हो

क्या वक़्त कुछ ज़्यादा है तुम्हारे पास
क्यों लिखते हो तुम, मुझ से पूछते हैं

तुम से बेहतर भी कोई और जानता है?

Too much Time in hands, They ask, that I Write;
Can anyone else ever know this Better but You?